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2019-10-10T11:36:38

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OLIVE GREEN - IVORY SHADE NET 90% 5mtr x 50 mtr. Olive Green – Ivory STRIPED SHADE CLOTH 90% 5 mtr. X 50 mtr. AGROTECH SUN SHADE SAILS make your household comfortable and cool by blocking 85-90% UV sunlight and protecting from dust and outdoor elements. AGOTECH SUN SHADE SAILS are ideal to use for Car Shading, gardens, keeping outdoor areas cool and for protecting plants in peak summers. Made with knitted 140 gsm HDPE breathable fabric, AGROTECH shade sails come with SS hooks at approximately every meter for ease of installation and use. All AGROTECH products are stitched using special UV stabilised threads for long life. Features: • Excellent strength • UV resistance • High durability Specifications: 100% virgin U.V. Stabilised Usage: Nursery, Agriculture, floriculture, horticulture, nursery, Fishing, Security Material: HDPE Color: Green -White, Dark Olive Green-ivory, Black, Blue-white, White, Red-white, brown-jute, Cherry red – ivory Width: 1m, 1.5m, 2m, 2.5m, 3m, 4m, 5m, 6m or as Per Custom Length : 50 Mtrs The Product is available in following range: • 90% Shade Percentage AGROTECH Road No. B-25, Shed No. C-1/B - 1501/2 GIDC Estate, Phase 4 Vitthal Udyognagar, Anand, Gujarat, India mob: +91 9427610980, 9825056637 rajniagro@yahoo.com rajniagro@gmail.com http://www.agroshadenet.in http://www.shadenet.in https://goo.gl/maps/YhMH3bSvfo8bFfX4A http://search.google.com/local/writereview?placeid=ChIJO5CIsOtNXjkROPzwPb_mH58

2019-10-05T10:49:15

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ts sting hurts a lot, but if they were to disappear, it would hurt much more. The Earthwatch Institute concluded in the last debate of the Royal Geographical Society of London, that bees are the most important living being on the planet, however, scientists have also made an announcement: Bees have already entered into extinction risk. Bees around the world have disappeared up to 90% according to recent studies, the reasons are different depending on the region, but among the main reasons are massive deforestation, lack of safe places for nests, lack of flowers, use uncontrolled pesticides, changes in soil, among others. Why has bees been declared as the most valuable being on our planet? The Apiculture Entrepreneurship Center of the Universidad Mayor (CeapiMayor) and the Apiculture Corporation of Chile (Cach) with the support of the Foundation for Agrarian Innovation (FIA), conducted a study where it was determined that bees are the only living being that it is not a carrier of any type of pathogen, regardless of whether it is a fungus, a virus or a bacterium. The agriculture of the world depends on 70% of these insects, to put it more clearly and directly, we could say that 70 of 100 foods are intervened in favor by bees. Also the pollination that the bees make allows the plants to reproduce, of which millions of animals feed, without them, the fauna would soon begin to disappear. The honey produced by bees, not only serve as food, but also provide many benefits to our health and our skin. According to a quote attributed to Albert Einstein, If the bees disappear, humans would have 4 years to live. Glyphosate Linked to Bee Deaths What are the reasons and hypotheses attributed to the early disappearance of bees? The Federal Institute of Technology of Switzerland, proposes a theory that blames the waves produced thanks to mobile telephony. They explain that these waves emitted during calls are capable of disorienting bees, causing them to lose their sense of direction and therefore their life is put in danger. The researcher and biologist Daniel Favre, along with other researchers, made 83 experiments that show that bees in the presence of these waves, produce a noise ten times higher than usual, behavior that has been observed to make it known to other bees. They are in danger and it is important to leave the hive. Undoubtedly, the greatest reason for its disappearance is attributed to the constant fumigation of crops, an example of this is what happens in Colombia, since during the last three years 34% of bees with agrotoxins have died of poisoning. Are there solutions to the problem? There are indeed solutions, the problem is that it is very difficult to carry them out, because there are very entrenched practices in production and agriculture. However, three solutions are proposed with the hope that they can be done in a short time: Prohibit, not reduce, the use of toxic pesticides. Promote completely natural agricultural alternatives. Perform constant research and monitoring of the health, welfare and conservation of bees. This is an example of the problem that is being experienced with bees and the urgency of creating changes in our management of resources, says Luciano Grisales, representative to the Chamber of Commerce of Colombia. It is of vital importance to establish the strategic nature of the protection and repopulation of bees and other pollinators, since not to do so in 10 years would not be counted on bees in Colombia. This would lead to a food catastrophe and a health crisis in the country. – Luciano expressed to Sustainable Week. * Note to readers: please click the share buttons above or below. Forward this article to your email lists. Crosspost on your blog site, internet forums. etc.

2019-09-30T09:55:33

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दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो सभी प्रकार की बुरी शक्तियों और बुरे विचारों से हमारी रक्षा करती हैं। दुर्गा शक्ति की उपस्थिति में नकारात्मक विचार और ताकत के अस्तित्व मिट जाते हैं। देवी को एक शेर या बाघ पर सवार दिखाया जाता है। यह संकेत है साहस और वीरता का, जो दुर्गा शक्ति का मूल तत्व है। नवदुर्गा यानी दुर्गा शक्ति के नौ रूप। जब आप जीवन में बाधाओं या बौद्धिक अवरोधों का सामना करते हैं, तो देवी के नौ रूप की विशेषताओं के स्मरण मात्र से सहायता प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए अधिक मददगार है, जो अपनी क्षमताओं पर संदेह करते हैं या फिर हमेशा चिंताग्रस्त रहते हैं। ऐसे लोग, जो ईष्र्या-द्वेष जैसे नकारात्मक भावों से भरे रहते हैं। 1. शक्ति का प्रवाह हैं शैलपुत्री देवी के नामों के उच्चारण से हमारी चेतना जाग्रत होती है और मन केंद्रित होकर निर्भय और शांत होता है। शक्ति का प्रवाह (शैलपुत्री) नवदुर्गा में पहली देवी हैं शैलपुत्री। शैल यानी पत्थर। इस रूप की आराधना से मन पत्थर के समान मजबूत होता है। इससे प्रतिबद्धता आती है। जब भी आपका मन अस्थिर होता है, शैलपुत्री उसे केंद्रित और प्रतिबद्ध करने में सहायता करती हैं। शैल शिखर को भी कहा जाता है। शैलपुत्री पर्वत शिखर की बेटी हैं। जब आप किसी भी अनुभव या गहन अनुभूति के शिखर पर पहुंच जाते हैं, तो आपको एक दिव्य चेतना की अनुभूति होती है। जब तक यह शिखर तक नहीं पहुंचती आप इसे समझ नहीं पाते, क्योंकि इसका जन्म उस शिखर से ही होता है। जब आप गहन अनुभूति में होते हैं, तब शक्ति के प्रवाह को अनुभव कर सकते हैं। उसी समय आप पाएंगे कि आप उस भाव से बाहर निकल रहे हैं। यही शैलपुत्री का अदृष्ट अभिप्राय है। 2. ब्रह्मचारिणी: जानें विस्तृत प्रकृति को ब्रह्मचर्य से शक्ति आती है। ब्रह्म का अर्थ है-अनंत और चर्य का अर्थ है चलना। यहां ब्रह्मचर्य का अर्थ हुआ अनंत में चलना। स्वयं को मात्र शरीर नहीं मानना चाहिए। हम अपनी विस्तृत प्रकृति को जानें और स्वयं को एक प्रकाश पुंज मानें। संसार में आप कुछ इस तरह चलें जैसे कि आप ही ब्रह्मांड हों। आप जितना खुश होंगे आपको अपनी काया का उतना ही कम एहसास होगा। जितना आप अनंत चेतना में होंगे, उतनी ही कम चिंता और अपनी भौतिक काया के भार का अनुभव करेंगे। यही है ब्रह्मचर्य का मर्म। देवी की विशेषताओं का आह्वान करने के लिए हमारी चेतना अनंत में विस्तार पाती है और अनंत में विचरण करने लगती है। यही है हमारी वास्तविक प्रकृति। उस स्थिति में आप बहुत जोश और साहस महसूस करेंगे। शक्ति के विशुद्ध रूप को दर्शाते हुए देवी को कुमारी के रूप में दिखाया गया है, जो स्वतंत्र व नवीन है और जो किसी के नियंत्रण में नहीं है। 3. चंद्रघंटा: विचारों और ध्वनियों की समग्रता नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। यह देवी घंटे के आकार का चंद्रमा धारण करती हैं। चंद्रमा का संबंध बुद्धि से है और घंटा सतर्कता का प्रतीक है। घंटे की ध्वनि दिमाग को वास्तविकता में ले आती है। ध्वनि से नि:शब्दता, नि:शब्दता से ध्वनि और फिर ध्वनि से नि:शब्दता की ध्वनि जब मस्तिष्क तक आती है, तब अंतत: वह विलीन हो जाती है और नि:स्तब्ध हो जाती है। जिस प्रकार चंद्रमा घटता-बढ़ता है, उसी प्रकार मस्तिष्क भी अस्थिर रहता है। चेतना संघटित होने से मस्तिष्क एक स्थान पर केंद्रित हो जाता है और इससे ऊर्जा में वृद्धि होती है। मस्तिष्क सतर्कता के साथ हमारे नियंत्रण में होता है। जब सतर्कता की गुणवत्ता और दृढ़ता की वृद्धि होती है, तो मस्तिष्क आभूषण के समान हो जाता है। मस्तिष्क दिव्य मां का स्वरूप और उनकी अभिव्यक्ति भी है। वह यदि शांति और संवेदना में उपस्थित है, तो दुख, कष्ट, भूख आदि में भी उसका साथ बना रहेगा। इसका सार यही है कि चाहे सुख मिले या दुख, हमें हर परिस्थिति को समान रूप से देखना चाहिए। समग्रता के साथ सभी विचारों, भावनाओं और ध्वनियों को एक नाद में समाहित करें, जैसे घंटे की ध्वनि होती है। यही चंद्रघंटा का अभिप्राय है। 4. कुष्मांडा: ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति की प्रतीक कुष्मांडा अर्थात कुम्हड़ा अर्थात सीताफल, जो शक्ति से भरपूर सब्जी है। एक सीताफल में अनेक बीज होते हैं, जिनसे और भी कई सीताफ ल उत्पन्न हो सकते हैं। यह ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति और शाश्वत प्रकृति का प्रतीक है। कुष्मांडा के रूप में देवी के भीतर समस्त सृजन समाया हुआ है। यह हमें उच्चतम प्राण प्रदान करती हैं, जो वृत्त के समान पूर्ण है। प्रकट और अप्रकट दोनों ही एक बहुत बड़ी गेंद या सीताफल के समान हैं, जो बताते हैं कि आपके पास यहां सभी प्रकार की विभिन्नताएं हैं। सूक्ष्मतम से विशाल तक। कुष्मांडा में कु यानी छोटा और ष् यानी ऊर्जा। यह ब्रह्मांड ऊर्जा से व्याप्त है सूक्ष्मतम से विशाल तक। एक छोटा-सा बीज पूरा फल बन जाता है और फिर फल बीज में बदल जाता है। हमारे भीतर की शक्ति की एक विशेषता है। यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और विशाल से विशालतम हो जाती है। दिव्य मां हमारे भीतर प्राण रूप में हैं। हमें सृष्टि तथा अपने जीवन में बहुलता और पूर्णता का अनुभव करना चाहिए। 5. स्कंदमाता: ज्ञान और क्रियाशीलता का साथ स्कंद या प्रभु सुब्रमण्यम की मां स्कंदमाता कहलाती हैं। गोद में बालक स्कंद को लिए माता को शेर पर सवार दर्शाया जाता है। इनका यह रूप साहस और करुणा का प्रतीक है। स्कंद अर्थात कुशल। ज्ञान की मदद से ही कुशल कार्य किए जा सकते हैं। श्री श्री रविशंकर बताते हैं कि कई बार हमारे पास ज्ञान तो होता है, लेकिन उसका कोई उद्देश्य नहीं होता है। अपने कार्य से अर्जित किए गए ज्ञान का एक उद्देश्य होता है। जब आप मेडिकल की पढ़ाई करते हैं, तो आप उसका इस्तेमाल रोज कर सकते हैं। जब आप टीवी ठीक करना सीखते हैं, तो आप उस शिक्षा को तब प्रयोग में लाते हैं, जब टीवी खराब हो जाता है। यह प्रयोगात्मक ज्ञान या दक्षता है। स्कंद भी हमारे जीवन में ज्ञान और क्रियाशीलता के एकसाथ आने के भाव को दर्शाता है। यदि जीवन में कठिन परिस्थिति आती है, तो क्या करना चाहिए? समस्या के समाधान के लिए हमें अपने ज्ञान का इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप बुद्धिमत्ता से कार्य करते हैं, तब स्कंद तत्व प्रकट होता है। स्कंदमाता कौशल, करुणा और साहस की प्रतीक हैं। 6. कात्यायनी: अन्याय और अज्ञानता को मिटाने का संदेश देवी मां का यह रूप देवताओं के क्रोध से उत्पन्न हुआ। सृष्टि में दिव्य और दानवी शक्तियां व्याप्त हैं। इसी तरह क्रोध भी सकारात्मक और नकारात्मक हो सकता है। क्रोध को अवगुण न मानें। क्रोध का भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। अच्छा क्रोध बुद्धिमत्ता से संबंधित है और बुरा क्रोध भावनाओं और स्वार्थ से। अच्छा क्रोध व्यापक दृष्टिबोध से आता है। यह अन्याय और अज्ञानता को मिटाने का संदेश देता है। अन्याय और नकारात्मकता को मिटाने के उद्देश्य से जो क्रोध उत्पन्न होता है, वह देवी कात्यायिनी का प्रतीक है। 7. कालरात्रि: ज्ञान और तटस्थता का संदेश काल अर्थात समय। सृष्टि में घटित होने वाली सभी घटनाओं का साक्षी है समय। रात्रि अर्थात गहन विश्राम या पूर्ण विश्राम। तन, मन और आत्मा के स्तर पर आराम। बिना विश्राम पाए आप दीप्तिमान कैसे होंगे? कालरात्रि गहनतम विश्राम के उस स्तर का प्रतीक है, जिससे आप जोश पा सकें। ये देवी आपको ज्ञान और तटस्थता प्रदान करती हैं। 8. महागौरी: परमानंद और मोक्ष प्रदाता देवी के इस रूप में ज्ञान, गमन, प्राप्ति और मोक्ष का संदेश छिपा है। महागौरी हमें विवेक प्रदान करती हैं, जो जीवन सुधा समान है। निष्कपटता से शुद्धता प्रकट होती है। महागौरी प्रतिभा और निष्कपटता का मिश्रण हैं। ये परमानंद और मोक्ष प्रदान करती हैं। 9. माता सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियों की दाता मां दुर्गा के नौवा स्वरूप माता सिद्धिदात्री का है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति को सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। इस पूरे संसार में उसके लिए कुछ अप्राप्य नहीं होता है। उसमें इस ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त कर लेने की क्षमता आ जाती है। दुर्गा सप्त्शालोकी दुर्गा सप्त्शालोकी माँ दुर्गा के 7 रूपों का परिचायक है जैसे की माँ महाकाली माँ सरस्वती माँ महालक्ष्मी और माँ जगदम्बा। दुर्गा सप्त्शालोकी माँ दुर्गा की सभी दानवों पर विजय को दर्शाता है। यह मान्यता है की माँ दुर्गा ने दुर्गा सप्त्शालोकी का पाठ भगवान शिव को सुनाया था। एक बार भगवान शिव ने माँ दुर्गा से पूछा की उनके भक्त ऐसा क्या करें की वह अपने जीवन में हमेशा सफलता पायें। माँ दुर्गा ने सुखमय शांत और सफल जीवन जीने के लिए दुर्गा सप्त्शालोकी के बारे में बताया। दुर्गा सप्त्शालोकी पाठ को चंडी पाठ की जगह भी पड़ा जा सकता है। दुर्गा सप्त्शलोकी पाठ ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य नारायण ऋषिः । अनुष्टुपादीनि छन्दांसि । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः । श्री जगदम्बाप्रीत्यर्थ पाठे विनियोगः ॥ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा । बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द चित्ता ॥२॥ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमो: स्तुते ॥३॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमो: स्तुते ॥४॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमो: स्तुते ॥५॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥७॥ देवी कवच श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिदम् । पठित्वा पाठयित्वा च नरो मुच्येत संकटात् ॥ १॥ अज्ञात्वा कवचं देवि दुर्गामंत्रं च यो जपेत् । स नाप्नोति फलं तस्य परं च नरकं व्रजेत् ॥ २॥ उमादेवी शिरः पातु ललाटे शूलधारिणी । चक्षुषी खेचरी पातु कर्णौ चत्वरवासिनी ॥ ३॥ सुगंधा नासिके पातु वदनं सर्वधारिणी । जिह्वां च चंडिकादेवी ग्रीवां सौभद्रिका तथा ॥ ४॥ अशोकवासिनी चेतो द्वौ बाहू वज्रधारिणी । हृदयं ललितादेवी उदरं सिंहवाहिनी ॥ ५॥ कटिं भगवती देवी द्वावूरू विंध्यवासिनी । महाबला च जंघे द्वे पादौ भूतलवासिनी ॥ ६॥ एवं स्थितासि देवि त्वं त्रैलोक्ये रक्षणात्मिका । रक्ष मां सर्वगात्रेषु दुर्गे देवि नमोस्तुते ॥ ७॥ ॥ इति दुर्गाकवचं संपूर्णम् ॥ देवी अपराध क्षमा स्त्रोत: ॥ अथ देव्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् ॥ न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः । मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४॥ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चा शीतेरधिकमपनीते तु वयसि । इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनु वर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जननीयं जपविधौ ॥ ६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७॥ न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८॥ नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १०॥ जगदम्ब विचित्र मत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि । एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२॥ ॐ ॥ सिद्ध कुंजिका स्त्रोतम शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥१॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥ गोपनीयं प्रयत्‍‌नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥ ॥अथ मन्त्रः॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥ ॥इति मन्त्रः॥ नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥२॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥७॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥ इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे। अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥ यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्। न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्। ॥ॐ तत्सत्॥ श्रीदुर्गामानस-पूजा उद्यच्चन्दनकुङ्कुमारुणपयोधाराभिराप्लावितां नानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके। आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितो मातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात्॥१॥ देवेन्द्रादिभिरर्चितं सुरगणैरादाय सिंहासनं चञ्चत्काञ्चनसंचयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम्। एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलं गन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके॥२॥ पश्‍चाद्देवि गृहाण शम्भुगृहिणि श्रीसुन्दरि प्रायशो गन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम्। तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसि स्‍नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे॥३॥ सुराधिपतिकामिनीकरसरोजनालीधृतां सचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम्। महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकां गृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे॥४॥ गन्धर्वामरकिन्नरप्रियतमासंतानहस्ताम्बुज- प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम्। मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलं चैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम्॥५॥ स्वर्णाकल्पितकुण्डले श्रुतियुगे हस्ताम्बुजे मुद्रिका मध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये। हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वके विन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम्॥६॥ ग्रीवायां धृतकान्तिकान्तपटलं ग्रैवेयकं सुन्दरं सिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम्। राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचने तद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे॥७॥ अमन्दतरमन्दरोन्मथितदुग्धसिन्धूद्भवं निशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे। गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै- र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम्॥८॥ कस्तूरीद्रवचन्दनागुरुसुधाधाराभिराप्लावितं चञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम्। देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्‍नादिकुम्भव्रजै- रम्भःशाम्भवि संभ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके॥९॥ कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती- मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्‍वमारादिभिः। पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसा ताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये॥१०॥ मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै- र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः। सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतये धूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥११॥ घृतद्रवपरिस्फुरद्रुचिररत्‍नयष्ट्यान्वितो महातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः। सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित- स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे॥१२॥ जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलं युक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिद्रव्यान्वितैर्व्यञ्‍जनैः। पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितं नैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥१३॥ लवङ्गकलिकोज्ज्वलं बहुलनागवल्लीदलं सजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम्। सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्‍नपात्रस्थितं गृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम्॥१४॥ शरत्प्रभवचन्द्रमः स्फुरितचन्द्रिकासुन्दरं गलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम्। गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलं महात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत्॥१५॥ मातस्त्वन्मुदमातनोतु सुभगस्त्रीभिः सदाऽऽन्दोलितं शुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम्। सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिः स्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः॥१६॥ स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्खभेरीनिनादैरुपगीयमाना। कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय॥१७॥ देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकं जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम्॥१८॥ एतैः षोडशभिः पद्यैरुपचारोपकल्पितैः। यः परां देवतां स्तौति स तेषां फलमाप्‍नुयात्॥१९॥ इति दुर्गातन्‍त्रे दुर्गामानसपूजा समाप्ता। दुर्गा क्षमा-प्रार्थना अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्‍वरि॥१॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्‍वरि॥२॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्‍वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥३॥ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत्। यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः॥४॥ सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके। इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरू॥५॥ अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्। तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्‍वरि॥६॥ कामेश्‍वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे। गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्‍वरि॥७॥ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गुहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्‍वरि॥८॥ श्रीदुर्गार्पणमस्तु। कंजक पूजा विधि: परंपरा कहती हैं कि घर की महिला 9 लड़कियों का स्वागत उनके पैरों को धो कर और उनकी कलायिओं पर मोली या लाल धागा बांध कर करती है। इन लड़कियां को एक पंक्ति में बैठाया जाता है और उपहारों के साथ हलवा, पूरी और छोले (जिसे 'भोग' भी कहा जाता है) दिए जाते है। इन छोटी लड़कियों को देवी दुर्गा के अवतार के रूप में देखा जाता है।कंजक पूजा आरम्भ करने से पहले कुछ वस्तुओं का होना आवश्यक है। उन वस्तुओं की सूचि इस प्रकार है: कलश (पिचर), आम के पत्ते, नारियल, रौली (कुमकुम), हल्दी, लाल पवित्र धागा, चावल, पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची, फूल, बेल पत्ते, मिठाई और दीपक। कलश को ऊपर तक पानी से भरें। कलश के मुंह पर आम के पत्ते को रखें। कलश की गर्दन पर पवित्र धागा बांधें कलश के पास देवी दुर्गा की मूर्ति को रखें और उनकी हल्दी, कुमकुम, फूल, चावल, बेल पत्तियों आदि से पूजा करें। लड़कियों के आने के बाद, उनके पैरों को धोने के लिए पानी को तैयार रखें। लड़कियों के पेरों को पानी से धोएं। कंजकों की उसी तरह से पूजा करें जिस तरह से आपने देवी दुर्गा की मूर्ति की पूजा की है। हल्दी, कुमकुम, चावल आदि को कंजकों पर लगायें। लड़कियों के सामने एक दीपक और धूप जलाएं। कंजकों को दियी जाने वाला भोजन शाकाहारी होना चाहिए और उसे घी पकाना चाहिए। आम तौर पर कंजकों को पूरी, काला चना, आलू की सबजी और हलवा खिलाया जाता है। लड़कियों को खिलाने के बाद, उन्हें उपहार दें उपहार में एक चुनरी, चूड़ी, कुमकुम, हल्दी, मिठाई और पैसे शामिल होना चाहिए। नवरात्री समापन नौ दिनों के पूजा खत्म हो जाने के बाद, दसवीं दिन पर दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। दसवें दिन, नहा-धो कर पूजा स्थान पर बैठें। माँ दुर्गा की मूर्ति को चोव्की से उठा कर उस स्थान पर रखें जहाँ पर वह स्थाई रूप से रखी जाती है। चोव्की पर रखे चढ़ावे को इकठा कर के उसे प्रसाद के रूप में लोगों में बाँट दें। चावल के दानो को पक्षियों में बाँट दें। कलश में रखे गंगा जल को अपने परिवार के सदस्यों और पूरे घर में छिड़क दें। सिक्कों को बाहर निकालें और उन्हें अपने दूसरे पैसे के साथ रखें। आम तौर पर मिट्टी के बर्तन में जौ के विकास पर निगरानी राखी जाती है। जौ के बीज को शकमभारी देवी माता के सम्मान में लगाया जाता है (जो दुर्गा पाठ के 11 वें अध्याय में वर्णित है और जो माँ दुर्गा की ही एक रूप हैं)। माँ शकमभारी देवी पोषण की माता हैं। यदि जौ के बीज बढ़ते हैं और प्रचुर मात्रा में ताजे हरे रंग में उगते हैं, तो यह एक निश्चित संकेत है कि आपके परिवार को समृद्धि और खुशी का आशीर्वाद मिलेगा। कुछ अंकुरित जौ माता दुर्गा को अर्पण करें। श्रीमद्देवी भागवत के अनुसार नवरात्र पूजा (Navratri Puja Vidhi in Hindi) से जुड़ी कुछ विशेष बातें निम्न हैं: * यदि श्रद्धालु नवरात्र में प्रतिदिन पूजा ना कर सके तो अष्टमी के दिन विशेष पूजा कर वह सभी फल प्राप्त कर सकता है। * अगर श्रद्धालु पूरे नवरात्र में उपवास ना कर सके तो तीन दिन उपवास करने पर भी वह सभी फल प्राप्त कर लेता है। कई लोग नवरात्र के प्रथम दिन और अष्टमी एवम नवमी का व्रत करते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह भी मान्य है। * नवरात्र व्रत देवी (Navratri Puja Vidhi) पूजन, हवन, कुमारी पूजन और ब्राह्मण भोजन से ही पूरा होता है।

2019-07-20T09:44:19

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कलौंजी की खेती कलौंजी के बीजों का औषधि के रूप में प्रयोग होता है । इसके बीजों को कृमिनाशक, उत्तेजक, प्रोटोजोवा रोधी के रूप में उपयोग किया जाता है । इसके बीजों के प्रयोग से पेशाब खुलकर आती है । इसके अतिरिक्त इसे कैंसर रोधी औषधि के रूप में प्रभावी पाया गया है । इसका प्रयोग बिच्छू काटने पर भी किया जाता है । रासायनिक संगठन इसके बीजों से सुगंधित तेल निकलता है, जिसमें निगेलोन तथा 2 मिथाइल 1-4 आइसोप्रोपिल, क्विनोन होते हैं । इसके बीजों में पामिटिक, मिरिस्टिक, स्टिएरिक, ओलेइक, लिनोलेइक तथा लिनोलेनिक नामक वसा अम्ल पाये जाते हैं । इसके अतिरिक्त इसके बीजों में बीटा सिटोस्टैराॅल भी पाया जाता है । भूमि इसकी खेती कंकरीली व पथरीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में सरलता पूर्वक की जा सकती है । जैसे मटियार, दुमट, बलुई तथा दोमट भूमि जिसमें जीवांश की अधिकता हो । जल निकास उचित होना चाहिए । खेती की तैयारी एक या दो उथली जुताई कर लें तथा पाटा चलाकर खेत समतल कर लें । अगेती धान की जाति जिसमें अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में पानी सूख जाता हो, परन्तु नमी बनी रहे तब इसकी उतेरा बोनी की जा सकती है । बीज दर कतारों में बोनी करने पर 8-10 किला तथा छिड़काव विधि से बोनी करने पर 16-17 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है । उन्नत जातियाँ एन.एस. 44- यह कलौंजी की उन्नत जाति है । यह 150-160 दिन में पक कर तैयार हो जाती है । इसमें 4.5 से 5.5 क्विंटल/हेक्टेयर तक है । खाद तथा उर्वरक कलौंजी के उत्पादन के लिए अधिक उर्वरक व खाद की आवश्यकता नहीं पड़ती है । फिर भी उचित रूप से इनका प्रयोग किया जाये तो इसकी उपज में काफी वृद्धि होती है । अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि 20:30:20 किलोग्राम नत्रजन, स्फुर, पोटाश प्रति हेक्टेयर बीज बोते समय देना चाहिए । सिंचाई कलौंजी सिंचित तथा असिंचित दोनों तरह से उगाई जाती है । भारी मिट्टी जिसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है, इसे असिंचित फसल के रूप में उगाया जा सकता है । इसमें 2-3 सिंचाई बुवाई के क्रमशः 30, 60 व 90 दिनों बाद करना चाहिए । निंदाई-गुड़ाई बीज अंकुरण के 20-25 दिन बाद पहली निंदाई-गुड़ाई कर देना चाहिए । आवश्यक होने पर दूसरी सिंचाई के पश्चात् निंदाई करना चाहिए । कटाई तथा उपज कलौंजी की फसल 120-130 दिनों में तैयार हो जाती है । जब फल पक कर पीले पड़ने लगे, तब तुरंत फसल की कटाई करें । देर करने से फल चटक जाता है एवं दानें खेत में बिखर जाते हैं । असिंचित फसल से 4-5 क्विंटल/हेक्टेयर एवं सिंचित फसल से 7-8 क्विंटल/हेक्टेयर उपज मिलती है । कीड़े तथा बीमारियाँ पौधों में उक्टा रोग का प्रकोप देखा गया है । बीजांकुर अवस्था में रोकथाम के लिए 2 ग्राम थायरम एवं 2 ग्राम बेबस्टिन कुल 4 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें ।

2019-07-19T09:17:15

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A guide to Shade Netting and its uses What is shade net? Shade net is a lightweight knitted polyethylene knitted fabric that provides plants and people with protection from the sun. Shade cloth fabric is available in densities ranging from 30% to 95% to suit the unique needs of different types of plants, flowers and crops. It can be used with greenhouses, hoop structures and in field applications. Additional uses include fences, windscreens and privacy barriers. Shade material is rot and mildew resistant, does not become brittle and is water permeable. It offers superior ventilation, improves light diffusion and keeps greenhouses cooler. As a result, shade cloth can help to lower energy costs by reducing the need to run fans as often in the warmer months. Installing shade net is quick and easy as is taking it down during the off-peak season. What is reflective shade and how is it beneficial in my greenhouse? Reflective shade helps create an optimum growing climate because it reflects the sun's radiation rather than absorbing it. Reflective shade assists in controlling the light, temperature and humidity balance. Reflective shade screens are also energy-saving. Excellent climate characteristics include low daytime temperature due to maximum reflection and high energy savings at night, which keeps crop temperature close to ambient. What is the difference between standard shade net and reflective shade net? Standard shade net is an affordable, extremely durable means of protecting plants and crops from direct sunlight. Shade net is placed on the exterior roof of a greenhouse, cold frame or high tunnel where it blocks a percentage of light from penetrating the building, hence keeping plants more comfortable. This type of shade material is appropriate for general gardening, farming and greenhouse applications and is widely used in the commercial farming and gardening industry Which shade material should I use? You can use shad net material according to your crop. Those shade material helps protect livestock, pets, plants, and people from direct sunlight and also works well as a privacy barrier or windscreen. Experience has shown that growers use mostly 50% to 75% density, with the high densities of 70% to 95% used in southern states and for light-sensitive plants in northern states. Many people find that using a high density shade on roofs and a lower density shade on walls is a good method for creating ideal shade conditions. Vegetable gardeners should check with their local University Agricultural Extension office to determine the shade cloth density that is appropriate for both the climate and plant variety. What does the shade percentage mean in relation to the shade material? Shade density is determined by the percentage of light blocked by the shade. For example, the definition of 75% shade is that only 25% of light passes through it. A shade percentage of 30 to 75% is ideal for vegetables, while 90 to 95% is ideal for protecting people. Advantages of shade net: Do not get Decay It is easy to wash Nets are easy to carry and easy to install Lightweight and can be relocated A shade percentage of 30-50% is ideal for vegetables and flowers. Ideal for gardens, plant nurseries, Home terrace gardening. Minimizes plant hassle and wind pressures to avoid damage to plants, enhances photosynthesis to stimulate plant growth. AGROTECH Road No. B-25, Shed No. C-1/B - 1501/2 GIDC Estate, Phase 4 Vitthal Udyognagar, Anand, Gujarat, India mob: +91 9427610980, 9825056637 rajniagro@yahoo.com rajniagro@gmail.com http://www.agroshadenet.in http://www.shadenet.in https://goo.gl/maps/YhMH3bSvfo8bFfX4A

2019-07-18T13:39:28

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Various uses of Shade Net Green Net, Plastic net, Agro Shade net are applied in various horticulture and agriculture cultivation of crops, shade net is also used as scaffolding nets, construction nets, Interior and exterior decoration. Green Net is also used as bird protecting nets. Green Net are Used for raising nurseries of fruits and vegetable. This Plastic Net Protects crops from natural weather disturbances such as wind, rain, hail, frost, snow, bird and insects. Agro Net is used in production of graft saplings and reducing its mortality during hot summer days. Agro Shade Net helps in quality drying of various agro products. Agriculture net are also used for protection in construction purpose this plastic net, green net are also known as Construction Safety Net. This Plastic net, Green Net, Agro Net are manufactured in Anand – Gujarat, shade net price is cost effective. Agricultural & Horticultural Shade Nets are basically used to provide shade to Green House in Agriculture sector which is the reason why they are also known as Agro Nets. These Green Houses are made out of Iron, Wooden or Plastic skeleton structures which are then covered by shade net as per specific requirements. These shade nets are made to provide various density shades ranging from 30% to 95%. These Green Houses help in providing year round protection from sunlight, heat, cold & wind for raising off season crops through the year. These Shade Nets are also Custom made. (As per customer requirements ) Anti Hail Net A high density polyethylene, super stabilized against UV rays, used ot prevent hail damage in a broad variety of crops. A high quality, net with latest German Design used to protect fruit, shrubs, buds, and seedings from damage caused by hail. Knitted in widths upto 9 mtrs. Other width are obtainable upon request. Flexible, Light, strong and easy to spread and can be placed on simple support structures. Scaffolding net / Construction Net Sun safe nets are used to improve the safety of construction site. Our Nets are durable and easy to install. Thus giving maximum safety at construction sites. Interior and Exterior decoration Special type of Nets are available for decoration. This type of shade nets are available in various sizes and different colours and designs. Two color nets are also available in any width. Sunsafe Nets are used by reputed tent house suppliers, Mandap services, and many other decorations. General Purpose application construction-safety-net shading-net plastic-net Sun safe nets are also applicable in various other fields such as, a. Wind Breakers, b. Covering Swimming pools. c. Poultry Shades. d. Parking Shades . Ultimate Solution for Agro Shade Net AGROTECH Road No. B-25, Shed No. C-1/B - 1501/2 GIDC Estate, Phase 4 Vitthal Udyognagar, Anand, Gujarat, India mob: +91 9427610980, 9825056637 rajniagro@yahoo.com rajniagro@gmail.com http://www.agroshadenet.in http://www.shadenet.in https://goo.gl/maps/YhMH3bSvfo8bFfX4A

2019-07-17T07:38:50

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Farm Shade Net is available in various shade factor. Our Farm shade net help in controlling temperature, light, water and moisture of nature. Moreover, this results in the best output and quality of crops and plants. Manufacturers and exporters of Farm shade Net made from virgin high-density polyethene (HDPE) with UV resistance treatment. We are leading manufacturer & supplier of All Purpose Shade Net. Net is used in many places. This is used for multiple purposes. For Example, Poultry Farm, Vanilla Growing, Gerberas, Nursery, Vermi Culture, Tomato / Chilli Growing, Floriculture, Grape Drying, Canopies, Dome Cover, Ground Carpet, Mandap etc. We are manufacturer and supplier of Shade Netting. These net are designed to safeguard the crops from U.V. Rays, Sunlight, Heat, Cold and Wind. We offering shade netting from 25% to 95% shade. We manufacture a wide variety of Shade Netting fences guards that are widely used in landscape and Garden industry, capable of providing complete safety to gardens. Safety Green Net is extensively used in Agriculture & Floriculture Industries. These ensure the enhanced development and rapid growth of the plants and there is an optimized use of water. These green net protect green vegetables and fresh food from dry and extreme moist conditions. These Safety Green net are highly in demand for the features of UV stabilizers, which provides excellent protection to the plants being kept inside the greenhouse. We export a wide range of nursery shade nets that are designed to protect agricultural lands from harsh weather conditions. They are available in a range of colours like white, black, and green. The offered range is well knitted by our experts to protect it from harmful ultra violet rays and extensively used in nurseries and greenhouses to provide shade and regulate air-movement. We at AGROTECH the Biggest manufacturer and supplier of agriculture Shade Net in Anand Gujarat India. These Agriculture Shade Net using premium grade raw materials and in accordance with the prevailing industry standards. Agriculture Shade Net provides complete protection to plants kept inside the shade and help in preventing plants from harsh weather conditions and UV rays. These shade net depending on the type of crop, its light and photosynthesis needs and also seedlings are better grown. We are leading manufacturer & supplier of Green House Net. Green House Net is available in standard dimensions of 3 m width by 50 m length. We customize the Green House Net as per our clients specifications detailed to us. Green House Nets are highly in demand for the features of UV stabilizers, which provides excellent protection to the plants being kept inside the green house. Various tests are performed to ensure the durability and longevity ofGreen House Net. AGROTECH Road No. B-25, Shed No. C-1/B - 1501/2 GIDC Estate, Phase 4 Vitthal Udyognagar, Anand, Gujarat, India mob: +91 9427610980, 9825056637 rajniagro@yahoo.com rajniagro@gmail.com http://www.agroshadenet.in http://www.shadenet.in https://goo.gl/maps/YhMH3bSvfo8bFfX4A

2019-07-16T12:53:13

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आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। • "अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया, चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः " गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

2019-07-16T12:17:20

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भगवान दत्तात्रेय की कहानी – कौन थे भगवान दत्तात्रेय और इनके 24 गुरु? दत्तात्रेय को शिव का अवतार माना जाता है, लेकिन वैष्णवजन उन्हें विष्णु के अंशावतार के रूप में मानते हैं। उनके शिष्यों में भगवान परशुराम का भी नाम लिया जाता है। तीन धर्म (वैष्णव, शैव और शाक्त) के संगम स्थल के रूप में त्रिपुरा में उन्होंने लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी। तंत्र से जुड़े होने के कारण दत्तात्रेय को नाथ परंपरा और संप्रदाय का अग्रज माना जाता है। इस नाथ संप्रदाय की भविष्य में अनेक शाखाएं निर्मित हुईं। भगवान दत्तात्रेय को नवनाथ संप्रदाय से संबोधित किया गया है। भगवान दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष माह में मनाई जाती है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु और श्रीगुरुदेवदत्त भी कहा जाता है। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया गया था। भगवान दत्तात्रेय की शिक्षा और दीक्षा… | दत्तात्रेय के २४ गुरु इसी पौराणिक इतिहास में पवित्र और पति ता देवी अनुसुया व उनके पति अत्रि का नाम प्रमुख तौर पर दर्ज है। एक बार की बात है माँ अनुसूया त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे पुत्र की प्राप्ति के लिए कड़े तप में लीन हो गईं, जिससे तीनों देवों की अर्धांगिनियां सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती को जलन होने लगी। तीनों ने अपनी पतियों से कहा कि वे भू लोक जाएं और वहां जाकर देवी अनुसुया की परीक्षा लें।ब्रह्मा, विष्णु और महेश संन्यासियों के वेश में अपनी जीवनसंगिनियों के कहने पर देवी अनुसुया की तप की परीक्षा लेने के लिए पृथ्वी लोक चले गए।अनुसुया के पास जाकर संन्यासी के वेश में गए त्रिदेव ने उन्हें भिक्षा देने को कहा, लेकिन उनकी एक शर्त भी थी।अनुसुया के पतित्व की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेव ने उनसे कहा कि वह भिक्षा मांगने आए हैं लेकिन उन्हें भिक्षा उनके सामान्य रूप में नहीं बल्कि अनुसुया की नग्न अवस्था में चाहिए।अर्थात देवी अनुसुया उन्हें तभी भिक्षा दे पाएंगी, जब वह त्रिदेव के समक्ष नग्न अवस्था में उपस्थित हों।त्रिदेव की ये बात सुनकर अनुसुया पहले तो हड़बड़ा गईं लेकिन फिर थोड़ा संभलकर उन्होंने मंत्र का जाप कर अभिमंत्रित जल उन तीनों संन्यासियों पर डाला।पानी की छींटे पड़ते ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ही शिशु रूप में बदल गए। शिशु रूप लेने के बाद अनुसुया ने उन्हें भिक्षा के रूप में स्तनपान करवाया।अनुसुया के पति अत्रि जब घर वापस आए तब अनुसुया ने उन्हें तीन बालकों का राज बताया। अत्रि तो पहले ही अपनी दिव्य दृष्टि से पूरे घटनाक्रम को देख चुके थे।अत्रि ने तीनों बालकों को गले से लगा लिया और अपनी शक्ति से तीनों बालकों को एक ही शिशु में बदल दिया, जिसके तीन सिर और छ: हाथ थे।ब्रह्मा, विष्णु, महेश के स्वर्ग वापस ना लौट पाने की वजह से उनकी पत्नियां चिंतित हो गईं और स्वयं देवी अनुसुया के पास आईं।सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें उनके पति सौंप दें। अनुसुया और उनके पति ने तीनों देवियों की बात मान ली और त्रिदेव अपने वास्तविक रूप में आ गए।अनुसुया और अत्रि से प्रसन्न और प्रभावित होने के बाद त्रिदेव ने उन्हें वरदान के तौर पर दत्तात्रेय रूपी पुत्र प्रदान किया, जो इन तीनों देवों का अवतार था।दत्तात्रेय का शरीर तो एक था लेकिन उनके तीन सिर और छ: भुजाएं थीं। विशेष रूप से दत्तात्रेय को विष्णु का अवतार माना जाता है। दत्तात्रेय के अन्य दो भाई चंद्र देव और ऋषि दुर्वाशा थे। चंद्रमा को ब्रह्मा और ऋषि दुर्वाशा को शिव का रूप ही माना जाता है। जिस दिन दत्तात्रेय का जन्म हुआ आज भी उस दिन को हिन्दू धर्म के लोग दत्तात्रेय जयंती के तौर पर मनाते हैं। भगवान दत्तात्रेय से एक बार राजा यदु ने उनके गुरु का नाम पूछा, भगवान दत्तात्रेय ने कहा : "आत्मा ही मेरा गुरु है, तथापि मैंने चौबीस व्यक्तियों से गुरु मानकर शिक्षा ग्रहण की है।" उन्होंने कहा मेरे चौबीस गुरुओं के नाम है : १) पृथ्वी २) जल ३) वायु ४) अग्नि ५) आकाश ६) सूर्य ७) चन्द्रमा ८) समुद्र ९) अजगर १०) कपोत ११) पतंगा १२) मछली १३) हिरण १४) हाथी १५) मधुमक्खी १६) शहद निकालने वाला १७) कुरर पक्षी १८) कुमारी कन्या १९) सर्प २०) बालक २१) पिंगला वैश्या २२) बाण बनाने वाला २३) मकड़ी २४) भृंगी कीट भगवान दत्तात्रेय :- "आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते। ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।।" भावार्थ - "जो आदि में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अन्त में सदाशिव है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है। ब्रह्मज्ञान जिनकी मुद्रा है, आकाश और भूतल जिनके वस्त्र है तथा जो साकार प्रज्ञानघन स्वरूप है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है।" (जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य) भगवान दत्तात्रेय भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अवतार माने जाते हैं। भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है और तीनो ईश्वरीय शक्तियों से समाहित महाराज दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफल और जल्दी से फल देने वाली है। महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगम्बर रहे थे। वे सर्वव्यापी है और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले हैं, अगर मानसिक, या कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जाये तो भक्त किसी भी कठिनाई से शीघ्र दूर हो जाते हैं।

2019-07-15T11:58:27

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